ARARIA अररिया ﺍﯼﺭﺭﺍ

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Archive for August, 2009

“रंगारंग कवि सम्मलेन सह मुशायरा” आयोजक – सुलभ सतरंगी

Posted by Sulabh on August 20, 2009

स्वतंत्रता दिवस की शाम है और आज हम कवियों को कुछ विशेष आज़ादी है…(क्षमायाचना सहित )

हर साल तरह 15 अगस्त की ये शाम खुशनुमा है. दिन भर के विभिन्न कार्यक्रमों में भागीदारी के बाद अब कवियों, शायरों, व्यंग्यकारों की बारी है. आज उनको भरपूर आजादी है वे अपने अपने तरीको से इस महफिल को परवान चढाये. मंच संचालन कर रहे हैं युवा हास्य कवि सुलभ जायसवाल “सतरंगी” -

सबसे पहले स्वागत है हमारे बुजुर्ग शायर जनाब शम्स जमाल साहब. (वयोवृद्ध शायर है – जोरदार स्वागत तालियों से)

@शम्स जमाल:

नौजवानी में हम बेहद इन्किलाबी हुए
अपने उसूलों पर जीये और आफताबी हुए
कांपती हाथो से चरागा लेकर, आज हम
एकबार फिर अपने शहर में किताबी हुए.

अगले कवि हैं श्री कमला प्रसाद बेखबर – “सर्वप्रथम सभी आगंतुकों को ६२वि वर्षगाँठ की शुभकामनाएं.”

@कमला प्रसाद बेखबर:

एक तरफ आजादी के ढोल नगारे हैं
वहीँ सीमा पर दहशत के नज़ारे हैं.
हम भी कहाँ सुरक्षित अपने गृहस्थी में
महंगाई के आगे फिर से हारे हैं.

*

(माहौल में हास्य रस घोलने आ रहे हैं – रहबान अली राकेश )

@रहबान अली राकेश:

मैं टीचर हूँ  अक्सर  इलेक्शन में जाता हूँ
पुलिस और संगीन के साये से मैं घबराता हूँ.

अपने मोहल्ले के साथियों को मतदान के नियम समझाता हूँ.
शिक्षा का हुआ कितना नुकसान
यह भी साथ में गिनाता हूँ.

चुनावी ड्यूटी और ओवरटाइम करके ही मैं पिकनिक के पैसे जुटाता हूँ.
मैं टीचर हूँ  अक्सर  इलेक्शन में जाता हूँ.

*

अगले शोरायकराम हैं – हारून रशीद ‘गाफिल’ अपने आँचलिक भाषा और परिचित अंदाज़ में -

@हारून रशीद ‘गाफिल’:

सुनह सुनह हो गाफिल भै,
इक दिन गेलाह हम्मे बम्बई
पहुँचते साथ भेलै ठगई
स्टेशन पर लेलकै हमरा से जुर्माना
मुंबई का टिकट दिखाओ तो जाना
कहलकै आल इंडिया पास नहीं चलेगा
मराठा परमिट नया लगेगा

की की बतैहयों तोहरा के आज
वहां चलै छै ठाकरे राज
भर दिन देत रहै छै गाली
घुमै छै ओकर साथ गुंडा मवाली

ना बुझै छै केकरो इंसान
बांटे पर लागल छै
फेर से हिन्दुस्तान   kavi-Sammelan-Araria

ऐसन नेता पर मुकदमा चलाओ
तब जाके सभै आजादी मनाओ  ||

*

अगले शायर हैं – जनाब मो. ताहा खामोश

@ताहा ‘खामोश’:

“सिर्फ एक शेर पढूंगा”

अपनी ग़ज़लों में रवानी और मैं कहाँ से लाऊं
बूढी हड्डियों में जवानी और मैं कहाँ से लाऊं
हर वो लम्हा याद है जब थे तुम तसकीने-हयात
तुमपे लुटाने को जिंदगानी और मैं कहाँ से लाऊं ||

*

जनाब हारून रशीद ने पुकारा है युवा कवि सुलभ सतरंगी को -

@सुलभ सतरंगी:

“अपनी विदेश नीति पर काफी क्षुब्ध हूँ…”

सन 62 का चीन लिखूं या आज 62वां हिन्दुस्तान लिखूं.
सन सैतालिस से धोखा खाते कितना पाकिस्तान लिखूं.
हिंदी-चीनी भाई-भाई, कह कर पीठ में छुरा घोपा
अरुणाचल पर अतिक्रमण या कश्मीर में कब्रिस्तान लिखूं.

*

अगले शायर हैं – मदन लाल ‘नश्तर’

@मदन लाल ‘नश्तर’ :
देखना है तो दौर-ए-तरक्की में दाग देखो
जम्हूर के बादलों से टपकता आग देखो
दूर तक फैली रौशनी मगर जेहन में अँधेरा है
अपने मकाँ में आग लगाये खुदगर्ज चराग देखो

(आगे जारी…)

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दास्तान-ए-आज़ादी – स्वतंत्रता संघर्ष में अररिया का योगदान अतुलनीय

Posted by Sulabh on August 14, 2009

Araria ka Azadi Sangharsh

Araria ka Azadi Sangharsh

नेपाल की अंतर्राष्ट्रीय सीमा के पास बसे अररिया जिले में आजादी के संघर्ष का इतिहास सुनहरा रहा है। सन 1857 की पहली जंग ए आजादी से लेकर 1942 की अगस्त क्रांति तक अररिया के सपूतों ने हर मौके पर अपनी शहादत दी और देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने में उल्लेखनीय योगदान दिया। जिला वासियों को अपने इन सपूतों पर गर्व है।

इतिहास के पन्नों के मुताबिक सन 1857 में जब अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति का बिगुल बजा तो जलपाईगुड़ी व ढाका में तैनात भारतीय जवानों ने अररिया जिले के नाथपुर में अंग्रेजी बंदूकों का बहादुरी के साथ सामना किया। अंग्रेजों को धूल चटाते हुए भारतीय फौजियों ने नेपाल के चतरा गद्दी में कोसी पार की और तराई जंगल मार्ग से अवध की बेगम हजरत महल का साथ देने के लिये आगे बढ़ गये। हालांकि इस दौरान कोसी की तेज धारा में उन्हें अपने कई घोड़े व सामान गंवाने पड़े लेकिन इस पार खड़ा मेजर रिचार्डसन उनका बाल भी बांका नहीं कर पाया।

bharat ke shaheed

bharat ke shaheed

बहरहाल सन 1857 के रणबांकुरों ने आजादी के जिस जज्बे का बीजारोपण किया उसका प्रतिफल बीसवीं सदी में देखने को मिला। जिले में स्वतंत्रता आंदोलन का आदिगुरु पं. रामदेनी तिवारी द्विजदेनी को माना जाता है। उनके व बाबू बसंत सिंह के नेतृत्व में सेनानियों की जो फौज इस इलाके में तैयार हुई, उसने अंग्रेजों को हर वक्त नाक में दम किये रखा। गांधी जी अनन्य सहयोगी रामलाल मंडल इसी जिले के भोड़हर गांव के थे। उन्होंने दंडी यात्रा में हिस्सा लिया था। उनकी आवाज बेहद सुरीली थी और वे बापू को रामायण सुनाया करते थे।

अगस्त क्रांति के मौके पर अररिया के सेनानियों ने अंग्रेजी बंदूकों का डटकर सामना किया। द्विजदेनी जी गिरफ्तार हो गये। भागलपुर सेंट्रल जेल में पुलिस ने उन्हें इतना पीटा कि वे शहीद हो गये। बीस सितंबर 1942 को फारबिसगंज में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जुलूस निकल रहा था। पुलिस ने जुलूस पर गोली चला दी। इस गोलीबारी में सुंदर लाल ततमा मौके पर ही शहीद हो गये। वहीं, रानीगंज थाने पर सेनानियों द्वारा तिरंगा फहराने की कोशिश में काली दास व जगतू हाजरा ने अपने प्राणों का बलिदान दिया।

लेकिन अंग्रेजी हुकूमत के दमन से सेनानियों के हौसले पस्त नहीं हुए। जिले में सेनानियों की फौज जोरशोर से उभरी तथा पूर्व के वरिष्ठ सेनानी पं. रामाधार द्विवेदी, कन्हैया लाल वर्मा, कमला नंद विश्वास, धनुषधारी चौधरी, हरिलाल झा, नागेश्वर झा, बुद्धिनाथ ठाकुर, सूर्यानंद साह, फणीश्वर नाथ रेणु, बोधनारायण सिंह, गणेश लाल वर्मा आदि की अगुआई में देश की आजादी का संघर्ष चलता रहा।

(Source: Jagran press doc.)

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धरमगंज, फोर्बेसगंज के नामी मेले

Posted by Sulabh on August 9, 2009

फारबिसगंज मेला, धरमगंज मेला, खगरा  मेला – ये वे नाम हैं जिनसे राज्यभर में अररिया जिले को लोकप्रियता हासिल है.

जलेबी, हवा मिठाई, पिपरा के खाजे, मीना बाज़ार, जादू टोना, झूले, सर्कस, मौत का कुआँ, नौटंकी (theature), पशु बिक्री और न जाने कितने रंग समेटे ये मेले अब अपनी पहचान खो रहे हैं. आधुनिकता का संजाल, ग्रामीणों का पलायन और बदलते जीवन शैली ने 24 घंटे चलने वाले इन मेलों का महत्व  कम कर दिया. हर साल शीत  माह में लगने वाले इन मेलो में अब वह आकर्षण  नहीं दीखता जिनके लिए ये सदियों से मशहूर रहे हैं.

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