(स्मृति दीर्घा से कुछ ख़ास पल – सुलभ जायसवाल, अररिया, बिहार)
बिन गुरु होईं न ज्ञान… जी यह उक्ति सर्वव्यापी सच है. बात चाहे पटना, दिल्ली की हो या सुदूर ग्राम जिले अररिया की. मैं यहाँ किसी कला संगीत, दर्शन साहित्य या धनुर्विद्या की बात नहीं कर रहा हूँ. मैं बात कर रहा हूँ, हिंदी भाषी क्षेत्रों के निम्न मध्यवर्गीय परिवार का हौव्वा, लड़कियों के विवाहपूर्व की अग्नि परीक्षा, प्रत्येक विद्यार्थी के जीवन की प्रथम कठिन मंजिल “मैट्रिक की परीक्षा” की. जैसे ही विद्यार्थी सातवीं आठवीं में कदम रखता है एक खोज शुरू हो जाती है मैट्रिक(दसवीं कक्षा) की परीक्षा तक की तैयारी के लिए एक अदद प्रिय मास्साब की. एक ऐसे शिक्षक की जो किशोर वय के विद्यार्थी की सही नब्ज़ पकड़े और मैट्रिक तक बेडा पार करवा दे. खोज होती है एक ऐसे साधारण कद काठी के मास्टर साहेब की जहाँ किसी भी आयुवर्ग के गार्जियन को मासिक ट्यूशन फी देने में ज्यादा परेशानी न होती हो. उन दिनों किसी भी मास्टर साहेब के घर के आँगन में या प्रवेश दरवाजे के आस पास शेड डालकर बेंच डेस्क जोड़कर पठन पाठन का कार्य बड़े इत्मीनान से होता, न कोई साइन बोर्ड न कोई बैनर न कोई इश्तहार. सिर्फ एक नाम “फलाना बाबू”.
लिली बाबू, देव बाबू, अनिल बाबू, चंपा लाल, सोहन लाल, सुशील मास्टर जैसे कुछ मास्साब खूब लोकप्रिय रहे. आज भी हैं. स्कूलों में चर्चा चलती तुम कहाँ पढ़ते हो, मैं फलाना बाबू के यहाँ, बहुत समझा समझा के पढ़ाते हैं… मैं तो जमुना बाबू के यहाँ पिछले साल उन्ही के यहाँ से सबसे ज्यादा पास हुआ था… अब अंग्रेजी पढने के लिए अनिल बाबू के पास जाने का जौरत नहीं, लालू(मुख्यमंत्री साहब) ने अंग्रेजी को ऑप्शनल कर दिया है ई साल से… लेकिन संस्कृत में बालेश्वर बाबू जैसा विद्वान् जिला भर में नहीं है हंसाते भी हैं और मारते भी बहुत हैं… प्राय ऐसी ही चर्चा चलती रहती किशोर बालकों के बीच.



