अररिया की धरती से जुड़ा था एक महान फ़ुटबॉलर – सईद अब्दुस ‘समद’ (1895-1964)
आज भारत में फूटबाल की स्थिति दयनीय है. विश्व फुटबॉल जगत में हमारा स्थान निराशाजनक मालूम पड़ता है. मगर हमारे इतिहास में फुटबॉल से जुड़ा एक स्वर्णिम अध्याय भी है. जी हाँ हम याद दिला रहे हैं एक महान फुटबॉल खिलाडी समद की. सईद अब्दुस समद ने अपने जीवनकाल में जिस प्रकार फुटबॉल खेल के प्रति समर्पण दिखाया और अपने विलक्षण प्रदर्शनों के बल हिन्दुस्तान का नाम रौशन किया ये समस्त विश्व के लिए उल्लेखनीय प्रकरण है. अररिया सीमा से सटे बांग्लादेश (तात्कालिक हिन्दुस्तान) के पत्रकार बन्धु जनाब मोहम्मद तवफिकुल हैदर की एक रिपोर्ट में हमें समद के बारे में जो जानकारी मिली वो रोचक है.
समद, सैयद अब्दुस (1895-1964) फुटबॉल खिलाड़ी. सैयद अब्दुस समद को बंगाल में फुटबॉल जादुकर (Football wizard) के रूप में जाना जाता था. वह 1895 में अररिया (तात्कालीन पूर्णिया, बिहार में पैदा हुए. अपनी औपचारिक शिक्षा के दौरान आठवीं कक्षा के बाद उसने स्कूल छोड़ा. समद अपने शुरुआती लड़कपन से फुटबॉल में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया. वह dribbling और tackling में आश्चर्यजनक थे विशेष रूप से माप शॉट लेने में उनका कौशल गजब का था. वह जब पूर्णिया जूनियर फुटबॉल क्लब के लिए खेले तब कोलकाता के फुटबॉल क्लब के प्रबंधकों का ध्यान आकर्षित किया. वे 1912 में कोलकाता मेन टाउन क्लब में शामिल हो गए. 1915-1920 के दौरान, उन्होंने सक्रिय रूप से ताजहत फुटबॉल क्लब रंगपुर के साथ जुड़े रहे.
1916 में समद, समरसेट फुटबॉल टीम इंग्लैंड के खिलाफ एक मैच में खेले. वह कलकत्ता Orients क्लब के लिए 1918 में और ईस्ट बंगाल रेलवे टीम के लिए 1921-1930 में खेले. समद ने अपने कॅरिअर का सबसे यादगार ट्राफी 1927 में भारतीय सेना के मुख्य लेफ्टिनेंट जनरल शेरवुड मॉल द्वारा संरक्षित शेरवुड फोरेस्ट्री टीम के खिलाफ विजयी गोल दागकर प्राप्त किया.
समद 1924 में भारतीय राष्ट्रीय टीम के लिए चुने गए और 1926 में कप्तानी की. उन्होंने बर्मा, सीलोन, हांगकांग, चीन, जावा, सुमात्रा, मलय, बोर्नियो, सिंगापुर और ब्रिटेन का दौरा किया. बीजिंग में खेले गए एक मैच में चीन के खिलाफ उन्होंने दूसरी हाफ में एक स्थानापन्न खिलाड़ी के रूप में खेलते हुए लगातार 4 गोल किया और पहले हाफ में 0-3 से पिछड़ने के बाद 4-3 से जीत दर्ज की. 1933 में 38 साल की उम्र में समद ने कलकत्ता मोहम्मडन स्पोर्टिंग क्लब (स्थापित 1891) ज्वाइन किया और अगले पांच वर्षों के लिए पुरे कौशल, जोश और समर्पण के साथ खेले. मुख्य रूप से उनके योगदान के कारण, उनकी टीम ने लगातार पाँच वर्षों तक प्रथम श्रेणी फुटबॉल लीग चैम्पियनशिप और भारतीय फुटबॉल एसोसिएशन शील्ड (IFA) टूर्नामेंट में जीत हासिल की. समद को ‘टूर्नामेंट के हीरो’ वाली टाईटल के साथ सम्मानित किया गया. समद और उनके बेटे गोलाम हुसैन एक साथ रेलवे टीम के लिए 1944 में भी खेले.
1947 के बाद, समद पूर्वी पाकिस्तान में दिनाजपुर जिले के पर्बतिपुर (बांग्लादेश) में जा बसे और पूर्वी पाकिस्तान रेलवे में रोजगार संभाला. 1957 में उनको राष्ट्रीय खेल परिषद बोर्ड का कोच नियुक्त किया गया था. उन्होंने 1962 में राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कार प्राप्त किया. 2 फरवरी 1964 को परबतिपुर में उनकी मृत्यु हो गई. बांग्लादेश फुटबॉल फेडरेशन उनके सम्मान में वार्षिक जादुकर समद स्मृति फुटबाल टूर्नामेंट आयोजित करता है.
बांग्लादेश सरकार ने फुटबॉल विजार्ड ‘समद’ के सम्मान में 2 फरवरी 1993 को एक डाक टिकट भी जारी किया है. आज क्रिकेट की चमक के बीच हम इस प्रकार खोये हुए हैं की आने वाली पीढी को शायद ही यकीन होगा की अंतर्राष्ट्रीय स्तर का एक फुटबॉल जादूगर कभी अररिया की धरती से जुड़ा था. वैसे समद की स्मृति में स्थानीय नेताजी सुभाष स्टेडियम के एक गेट का नाम ‘समद द्वार’ रखा गया है.
सुलभ जयसवाल


