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    (ऐतिहासिक क्षण ) # Broad Gague starts at Jogbani-Katihar Rail lines. रेलमंत्री द्वारा हरी झंडी दिखाने के साथ ही नयी लाइन पर जोगबनी से कोलकाता के लिये पहली रेल चल पड़ी। # Thanks a ton to Railway deptt.
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      Ashutosh Dubey
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      Ashutosh Dubey
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      वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !हाथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहेध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहींवीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ होतुम निडर डरो नहीं तुम निडर डटो वहींवीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !प्रात हो कि रात हो संग हो न साथ होसूर्य से बढ़े चलो चन्द्र से बढ़े चलोवीर तुम ब […]
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      मेरी वोवो एक आदत हैजो चिपकी है तन मन से।वो शराब है।जो नशा उतारती है।खोल देती है ताले।चाहे कितने भी जंगलगे क्यों न हों।कल्पना की दुनिया से वोखींच लेती है सच्चाईके धरातल पर।महीने की कमाईबच्चों की पढ़ाईनमक तेल से लेकररिश्तों की गांठों तकवह खोलती हैं परतेंमन की उन्मुक्त उड़ान कोपल भर में अपने चाबुक सेला खड़ा करती है धरातल परअवसाद और कष्ट के गहनपलों को चुनकर बाहर नि […]
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      पता बदलने की सूचना हेतु पत्र Letter for Change of Addressवसंतकुंजनयी दिल्लीदिनांकः १५/०८/२०१७सेवा मेंकक्षा अध्यापिका जी ,नयोदय विद्यालय,राजशाही नगर ,नयी दिल्लीविषय - पता बदलने की सूचना हेतु महोदया , सविनय निवेदन है कि मैं आपकी कक्षा की एक जिम्मेदार छात्रा हूँ .मैं आपको यह सूचित करना चाहती हूँ कि मेरे घर का पता २३० ,राजदंगा रोड़ा से बदलकर ,विकासनगर ,नयी दिल्ली […]
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Archive for December, 2008

Phanishwar Nath Renu (1921-1977)

Posted by Sulabh on December 21, 2008

 

phanishwar-nath-renu hindi saahityakaar

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 Phanishwar Nath Renu is a revolutionary novelist of the post-Premchand era of the Hindi literature. He was the voice of the contemporary rural India and among the pioneers to bring regional voices into the mainstream Hindi literature. He was born on 4th March 1921in at  Aurahi Hingna village near Forbesganj, in Araria district (then Purnea district) Bihar. He received his primary education in Araria and Forbesganj. He passed his Matriculation from Viratnagar Adarsh Vidyalaya(school), Viratnagar, Nepal. And Intermediate from Kashi Hindu Vishvavidyalay (university) in 1942. He actively participated in the Indian freedom struggle in 1942. He was even involved in the Nepali revolutionary struggle in 1950 against the dictatorship and oppression of the Rana’s which led in the establishment of democracy in Nepal.

Phanishwar Nath Renu’s writings had an intimate feeling with the reader, which he developed by using the local flavor of the language instead of Khari Boli. Few of the novels written by him are Maila Anchal, Parti Parikatha, Juloos, Deerghtapa, Kitne Chaurahe and Paltu Babu Road. Among all his works Maila Anchal (1954) is his masterpiece. He was honored with Padma Shri by the Government of India for this novel. This novel mainly depicts the contemporary social life of the people who are poor and backward. It is considered to be one of the finest novels ever written in Hindi literature. It depicts the landscape of Bihar, the division of society on the basis of caste, Indian struggle of independence, and the true face of rural India. It has introduced a new form of novel by radically changing the structure and narrative style of Hindi novels.

Phanishwar Nath Renu even wrote short stories namely Maare Gaye Gulfam, Ek Adim Ratri Ki Mehak, Lal Pan Ki Begum Panchlight, Thes Samvadiya, Tabe Ekla Chalo Re, and few collection of stories include Thumri Agnikhor, and Acche Aadmi. His short story Panchlight is known for its pleasing portrayal of human behavior. His writings are very similar to Premchand’s writings especially in respect of choice of themes. Another short story Maare Gaye Gulfam was made into a film entitled Teesri Kasam.

This legendary writer left us on 11th April 1977.

Literary works –

 Novels

 Stories

  • Maare Gaye Gulfam (Teesri Kasam)
  • Lal Pan Ki Begum
  • Panchlight
  • Thes
  • Samvadiya
  • Tabe Ekla Chalo Re
  • Lakshmi

Story collections (Katha-Sangrah)

  • Thumri
  • Agnikhor
  • Acche Aadmi
  • Ek Adim Ratri Ki Mehak
  • Ek Shravani duphari

Memoirs

  • Rindjal Dhanjal
  • Van Tulsi ki gandh
  • Shrut Ashrut Purva

 Reportage

  • HrinJal- DhanJal
  • Nepali Kranti Katha
  • Van tulsi ki gandh
  • Shruth Asruth purve
  • Pahli kranti katha

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Football Wizard Syed Abdus Samad (1895-1964)

Posted by Sulabh on December 18, 2008

अररिया की धरती से जुड़ा था एक महान फ़ुटबॉलर – सईद अब्दुस ‘समद’ (1895-1964)

Samad-Football wizardआज भारत में फूटबाल की स्थिति दयनीय है.  विश्व फुटबॉल जगत में हमारा स्थान निराशाजनक मालूम पड़ता है. मगर हमारे इतिहास में फुटबॉल से जुड़ा एक स्वर्णिम अध्याय भी है. जी हाँ हम याद दिला रहे हैं एक महान फुटबॉल खिलाडी समद की. सईद अब्दुस समद ने अपने जीवनकाल में जिस प्रकार फुटबॉल खेल के प्रति समर्पण दिखाया और अपने विलक्षण प्रदर्शनों के बल हिन्दुस्तान का नाम रौशन किया ये समस्त विश्व के लिए उल्लेखनीय प्रकरण है. अररिया सीमा से सटे बांग्लादेश (तात्कालिक हिन्दुस्तान) के पत्रकार बन्धु जनाब मोहम्मद तवफिकुल हैदर की एक रिपोर्ट में हमें समद के बारे में जो जानकारी मिली वो रोचक है.

समद, सैयद अब्दुस (1895-1964) फुटबॉल खिलाड़ी. सैयद अब्दुस समद को बंगाल में फुटबॉल जादुकर (Football wizard) के रूप में जाना जाता था. वह 1895 में अररिया (तात्कालीन पूर्णिया, बिहार में पैदा हुए. अपनी औपचारिक शिक्षा के दौरान आठवीं कक्षा के बाद उसने स्कूल छोड़ा. समद अपने शुरुआती लड़कपन से फुटबॉल में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया. वह dribbling और tackling में  आश्चर्यजनक थे विशेष रूप से माप शॉट लेने में उनका कौशल गजब का था. वह जब पूर्णिया जूनियर फुटबॉल क्लब के लिए खेले तब कोलकाता के फुटबॉल क्लब के प्रबंधकों का ध्यान आकर्षित किया. वे 1912 में कोलकाता मेन टाउन क्लब में शामिल हो गए. 1915-1920 के दौरान, उन्होंने सक्रिय रूप से ताजहत फुटबॉल क्लब रंगपुर के साथ जुड़े रहे.

1916 में समद, समरसेट फुटबॉल टीम इंग्लैंड के खिलाफ एक मैच में खेले. वह कलकत्ता Orients क्लब के लिए 1918 में और ईस्ट बंगाल रेलवे टीम के लिए 1921-1930 में खेले. समद ने अपने कॅरिअर का सबसे यादगार ट्राफी 1927 में भारतीय सेना के मुख्य लेफ्टिनेंट जनरल शेरवुड मॉल द्वारा संरक्षित शेरवुड फोरेस्ट्री टीम के खिलाफ  विजयी गोल दागकर प्राप्त किया.

समद 1924 में भारतीय राष्ट्रीय टीम के लिए चुने गए और 1926 में कप्तानी की. उन्होंने बर्मा, सीलोन, हांगकांग, चीन, जावा, सुमात्रा, मलय, बोर्नियो, सिंगापुर और ब्रिटेन का दौरा किया. बीजिंग में खेले गए एक मैच में चीन के खिलाफ उन्होंने दूसरी हाफ में एक स्थानापन्न खिलाड़ी के रूप में खेलते हुए लगातार 4 गोल किया और पहले हाफ में 0-3 से पिछड़ने के बाद 4-3 से जीत दर्ज की. 1933 में 38 साल की उम्र में समद ने  कलकत्ता मोहम्मडन स्पोर्टिंग क्लब (स्थापित 1891)  ज्वाइन किया और अगले पांच वर्षों के लिए पुरे कौशल, जोश और समर्पण के साथ खेले. मुख्य रूप से उनके योगदान के कारण, उनकी टीम ने लगातार पाँच वर्षों तक प्रथम श्रेणी फुटबॉल लीग चैम्पियनशिप और भारतीय फुटबॉल एसोसिएशन शील्ड (IFA) टूर्नामेंट में जीत हासिल की. समद को ‘टूर्नामेंट के हीरो’ वाली टाईटल के साथ सम्मानित किया गया. समद और उनके बेटे गोलाम हुसैन एक साथ रेलवे टीम के लिए 1944 में भी खेले.

1947 के बाद, समद पूर्वी पाकिस्तान में दिनाजपुर जिले के पर्बतिपुर (बांग्लादेश)  में जा बसे और पूर्वी पाकिस्तान  रेलवे में रोजगार संभाला. 1957 में उनको राष्ट्रीय खेल परिषद बोर्ड का कोच नियुक्त किया गया था. उन्होंने 1962 में राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कार प्राप्त किया. 2 फरवरी 1964 को परबतिपुर में उनकी मृत्यु हो गई. बांग्लादेश फुटबॉल फेडरेशन उनके सम्मान में वार्षिक जादुकर समद स्मृति फुटबाल टूर्नामेंट आयोजित करता है.

बांग्लादेश सरकार ने फुटबॉल विजार्ड ‘समद’ के सम्मान में 2 फरवरी 1993 को एक डाक टिकट भी जारी किया है. आज क्रिकेट की चमक के बीच हम इस प्रकार खोये हुए हैं की आने वाली पीढी को शायद ही यकीन होगा की अंतर्राष्ट्रीय स्तर का एक फुटबॉल जादूगर कभी अररिया की धरती से जुड़ा था. वैसे समद की स्मृति में स्थानीय नेताजी सुभाष स्टेडियम के एक गेट का नाम ‘समद द्वार’ रखा गया है.

सुलभ जयसवाल

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