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हाई स्कूल का प्रांगण, अन्नपुर्णा मिठाई दूकान, उमा टाकिज के फिल्म और नेताजी सुभाष स्टेडियम

Posted by Sulabh on October 7, 2009

(स्मृति दीर्घा से कुछ ख़ास पल – सुलभ जायसवाल, अररिया, बिहार)

बहुत ज्यादा नहीं 12-15 वर्ष पहले की बात है. उन दिनों अररिया में सरकारी स्कूल (मध्य विद्यालय और उच्च विद्यालय) में टिफिन / लंच टाइम तक टिक गए तो समझा जाता है की आप अच्छे विद्यार्थी हैं. हाजरी बना प्रथम कक्षा कर के निकल गए  तो आप नियमित विद्यार्थी हैं. यदि प्रतिदिन सातों कक्षा (सायं 4 बजे तक) उपस्थित रहे तो आप बहुत पढाकू हैं.  बहुत पढाकू होना कभी भी स्वास्थय के लिए ठीक नहीं माना गया है… सावधान ऐसी स्थिति में आपके मित्रों की संख्या काफी कम होगी और मुसीबत में या राह चलते कोई झगडा फसाद हो जाए तो आप शायद रोते हुए घर को लौटेंगे.

मेरे आठवीं कक्षा में नामांकन के 2  सप्ताह बाद ही मुझे अपने साथ के और कुछ वरिष्ठ साथियों के कहे अनुसार अपनी दिनचर्या में फेर बदल करना पड़ा. हाई स्कूल के बड़े मैदान में एक कोने के तरफ चापाकल हुआ करती है जहाँ से पानी पीने के बाद नज़र बचाते हुए बांस के टूटे दीवारों, नालियों, ईटों के ढेरों के पास होते हुए अन्नपुर्णा मिठाई दूकान(जहाँ चाय नास्ते का भी उत्तम प्रबंध रहता था) के पिछवारे से प्रवेश करना प्राय सरल ही था. दूकान में अन्दर आने के बाद जल्दी से किसी मेज़-कुर्सी पर जम जाईये. अब आप अररिया शहर के प्रमुख चांदनी चौक पर अवस्थित अन्नपूर्णा होटल के एक सम्मानित ग्राहक हैं.  धड़कते दिल के साथ दो रूपये में समोसे के साथ साथ पकोडे भी खा सकते हैं. धड़कते दिल से कहने का मतलब इतना है की हो सकता है उस समय संयोग से आपके बड़े भैया, चाचा या पिताजी भी चाय पीने वहां पहुँच सकते है. आपातकालीन स्थिति में आपके पास वापिस उसी स्कूल में पहुँचने का रास्ते सदैव खुला रहता है (सिर्फ उनके लिए बंद रहा है जिसने कभी होटल के वेटरों से बदतमीजी की हो).

अब यदि आपके पास पैसे हैं कम से कम तीन-चार रूपये भी तो आप उस होटल से बमुश्किल ढाई-तीन सौ मीटर मैन रोड पर  आगे उमा टाकिज में दाखिल हो सकते हैं. और 70 से 90 दशक के बीच की बॉलीवुड की सदाबहार, साधारण, औसत, हीट और सिल्वर जुबली वाली किसी फिल्म का प्रथम, द्वितीय या तृतीय श्रेणी में बैठ कर आनंद उठा सकते हैं.

बीते कुछ सालों  में शहर के सबसे व्यस्त रोड मेंन पर तरह तरह के दुकानों की संख्या में इजाफा ही हुआ है. लेकिन यह  उमा टाकिज जो शहरी-देहाती जनाना-मर्दाना के भीड़ से गुंजायमान रहता था, अपनी शान को बरकारार  न रख पाया. अकुशल प्रबंधन, मालिक बंधुओं की आपसी अनबन और हॉल में बैठकर सिनेमा देखने का घटता क्रेज़ आदि मिलकर ने शहर के एक आकर्षक पिक्चर पैलेस को कहीं का न छोड़ा.  इस मामले में अन्नपूर्ण स्वीट्स जरुर अपनी प्रतिष्ठा बचाने में सफल रहा. हालांकि दूकान दो भागो में बाँट चुकी है, अब बड़े-बड़े समोसे (सिंघारे)  और स्वादिस्ट पकोड़े  नहीं मिलते हैं. लेकिन आज भी ये चांदनी चौक का एक प्रमुख स्वीट्स कार्नर है.

हाई स्कूल/H.E. जिसका सम्पूर्ण नाम “राजकीयकृत उच्च विद्यालय, अररिया” १९११ में निर्मित भवन का प्रवेश द्वार सहित कुछेक बार मरम्मत हो चूका है, अन्दर के प्रांगन और मैदान में अब यहाँ कोलाहल काफी कम रहता है. मगर मुख्य सड़क पर हमेशा की तरह बाज़ार ठेले और फुटपाथ समेत शोरशराबे से शोभित है.

स्कूल भवन की चारदीवारी शहर के व्यस्त हाट-बाज़ार से जुडी हुई है. सुना है बाज़ार के कुछ दुकानों का किराया स्कूल के फंड में जाता है, वैसे हाट-बाज़ार के बहुत सारे दूकान राज्य सरकार, नगर पालिका और निजी सम्पति के विवाद से ग्रसित है. (माफ़ी चाहूँगा, इस बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं है).

कई बार सोचा की स्कूल में जाकर पता लगाऊं की क्या अब भी वहां आठवीं, नौवीं और दशवीं कक्षा में हिंदी के गद्द-सोपान और वही काव्य संग्रह पढाये जाते हैं या CBSE की तर्ज पर कुछ व्यापक बदलाव  यहाँ भी हुए हैं. क्या अब भी विशेस्वर बाबू संस्कृत की कक्षा नियमित लेते हैं. मुझे आज भी राष्ट्रकवि श्री माखनलाल चुतर्वेदी द्बारा रचित कविता “चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गुथा जाऊं…(शीर्षक- पुष्प की अभिलाषा)” विशेष पसंद है.   कथाकार रामवृक्ष बेनीपुरी ने कैसे 13 वर्ष की उम्र मात्र में साहित्य सृजन का बीडा उठाया, ये बाते मैं उन दिनों अक्सर सोचता था और कुछ लिखने का प्रयास करता था.

Subhash stadium Araria

Subhash stadium Araria

इसी क्रम में कुछ सफलता मिली थी पत्रिका सुमन-सौरभ के सौजन्य से. कितना खुश हुआ था मैं जब पहली बार मेरा नाम शीर्षक प्रतियोगिता के लिए सर्वश्रेष्ट चुना गया था. पुरे मोहल्ले में मेरा नाम सा हो गया था. और सबसे महत्वपूर्ण वो दिन स्वंत्रता दिवस (15-अगस्त-1996) नौंवीं कक्षा में पढ़ते हुए जिला-स्तरीय विज्ञान प्रदर्शनी में भाग लेकर प्रथम स्थान प्राप्त किया. नेताजी सुभाष स्टेडियम में पारितोषिक वितरण समारोह में जिला-पदाधिकारी श्री बी. प्रधान द्वारा पुरस्कृत हुआ. चारो तरफ से  तालियों की गूंज के बीच उनसे हाथ मिलाकर पुरस्कार ग्रहण करते हुए यही सोच रहा था की एक दिन चाँद को भी छु लूँगा.  चाँद को छूने से मेरा मतलब यह था की मैं आगे चलकर इसरो या भावा एटॉमिक रिसर्च सेंटर में अन्तरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में कार्य करूँ. ये तो किशोर मन की उड़ान थी. आज एक व्यस्क और समझदार युवा के रूप में इतना ही सोच पता हूँ की भारत में बेरोजगारी और भ्रष्ट्राचार के उन्मूलन में कुछ महती कार्य करने की जरुरत है और चुनौतयां यह है की निजी क्षेत्र में  एक आई.टी. कंसल्टेंट के रूप में हर महीने नियमित बहुत सारे कार्य निष्पादन के साथ साथ यथोचित धनोपार्जन करते हुए किस प्रकार लक्ष्य की दिशा में आगे बढूँ. थोडा चिंतित हूँ परन्तु हताश बिलकुल नहीं.

 

 

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2 Responses to “हाई स्कूल का प्रांगण, अन्नपुर्णा मिठाई दूकान, उमा टाकिज के फिल्म और नेताजी सुभाष स्टेडियम”

  1. Aap bahut achha likhte hai…
    aaj es nibandh ko dekhkar hame v H.E me bitaye din yaad aane lage….

  2. Imtiaz Ahmed said

    Dear,

    It was well scripted and touching memoirs of Araria.
    This skill will be ladder of yours success in comming time,U will catch the Moon.

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