ARARIA अररिया ﺍﺭﺭﯼﺍ

~~~A showery district of north-eastern Bihar (India)~~~ www.ArariaToday.com

  • ARARIA FB LIKE

  • Recent Comments

    Masoom on Railway Time Table Araria…
    Raman raghav on Sri Sri 108 Mahakali Mandir…
    parwez alam on Railway Time Table Araria…
    ajay agrawal on Araria at a glance
    Tausif Ahmad on Railway Time Table Araria…
    aman on Thana in Araria – Police…
  • स्थानीय समाचार Source Araria News

    http://rss.jagran.com/local/bihar/araria.xml Subscribe in a reader
    Jagran News
    Local News from Kishanganj, Purnia and Katihar
    इन्टरनेट पर हिंदी साहित्य - कविताओं, ग़ज़लों और संस्मरणों के माध्यम से
    इन्टरनेट पर हिंदी साहित्य का समग्र रूप Saahitya Shilpi
    चिटठा: यादों का इंद्रजाल


    मैंने गाँधी जयंती पर एक संकल्प लिया! आप भी लें. यहाँ पढ़े
  • Recent Posts

  • Historial News towards Development

    (ऐतिहासिक क्षण ) # Broad Gague starts at Jogbani-Katihar Rail lines. रेलमंत्री द्वारा हरी झंडी दिखाने के साथ ही नयी लाइन पर जोगबनी से कोलकाता के लिये पहली रेल चल पड़ी। # Thanks a ton to Railway deptt.
  • RSS Hindikunj Se

    • विश्व योग दिवस
      मानव और प्रकृति के मध्य समन्वय ही योग है(21 जून को विश्व योग दिवस पर विशेष )महर्षि पतंजलि के अनुसार - ‘‘अभ्यास-वैराग्य द्वारा चित्त की वृत्तियों पर नियंत्रण करना ही योग है।’’ विष्णुपुराण के अनुसार -‘‘जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्णतया मिलन ही योग ;अद्वेतानुभुति योग कहलाता है।’’विश्व योग दिवसभगवद्गीताबोध के  अनुसार- ‘‘दुःख-सुख, पाप-पुण्य,शत्रु-मित्र, शीत-उष्ण […]
      Ashutosh Dubey
    • मुश्किलों से जूझते रहना क़लम
      मुश्किलों से जूझते रहना क़लम            मुश्किलों  से जूझते  रहना क़लम।हौंसलों की कहानी कहना क़लम।।        है   विवशता  से  भरा  हर  आदमी।        बोझ   कितना लिए है  सर आदमी।बृज राज किशोर " राहगीर "        आज भी कुछ काम मिल पाया नहीं,        टूटकर  चल  दिया  है  घर आदमी।दर्द उसका भी ज़रा सहना क़लम।मुश्किलों से  जूझते रहना क़लम।।        रोटियाँ ही   […]
      Ashutosh Dubey
    • मईया अब तुम ही समझाओ
       मईया अब तुम ही समझाओमईया अब तुम ही समझाओमन में प्रश्न अखरता है।रात होते ही चंदा क्यों मेरा पीछा करता है।मैं जो चलूँ तो चलने लगतारुक जाऊँ तो रुक जाता है।मैं जो हँसू तो हँसने लगताशरमाऊँ तो शरमाता है।मईया बोली सुन रे बेटा,इसमें नहीं दुराहा है।वैसे भी चंदा तो बेटा लगता तेरा मामा है।जैसे भौरा रस की खातिरफूलों पर मंडराता है।अम्बर अवनी को बाँहों मेंभरने को हाथ बढ़ा […]
      Ashutosh Dubey
    • चुनावी हथकंडे
      चुनावी हथकंडेरास्ते मे देखाएक नेता जैसाआदमी....एक गरीब के पैरपर पड़ा था।मुझे आश्चर्य हुआपता चला वहचुनाव में खड़ा था।कुछ दूरगरीबों का मोहल्ला था।देखा वहां बहुत हल्ला था।वहां एक घटना घटी।घर घर शराब बटी।रात में जबसब सो रहे थे।नेताजी...चुनाव के बीजबो रहे थे।नेता जी के लोगदुबक करमलाई चाट रहे थे।चुनावी पर्चियां मेंरख करपांच सौ के नोटबांट रहे थे।नेता जी महिलाओंसे रिश […]
      Ashutosh Dubey
    • व्यंग्य
      व्यंग्य जब मैं कहता हूँ ‘मेरी समझ में व्यंग्य’ तो इसे दो भागों में बांटा जा सकता है-पहला –‘मेरी समझ’ और दूसरा –‘व्यंग्य’ .जब मैं अपनी समझ के बारे में सोचता हूँ तो हंसी आती है .मुझे समझदार कोई और तो खैर क्या मानेगा मैं खुद ही नहीं मानता .अपने अब तक के किये पर नजर दौड़ता हूँ तो समझदारी से किया हुआ एक आधा काम भी नजर नहीं आता फिर वह लिखाई-पढाई हो ,नौकरी हो, प्रेम […]
      Ashutosh Dubey
    • मेरी माँ
      मेरी माँमाँ को ईश्वर से मिला है ममता का वरदानसच पूछो तो माँ इंसान नहीं है भगवानजब कभी मन होता बैचेनमाँ के सीने से लगकर मिलता है चैनमाँ ही है जो हमे बोलना सिखाती हैखुद थोडा सा खाकर रह जाती हमें भरपेट खिलाती हैमाँ करती है अपने बच्चों के लिए दुआ भी जाती हैमाँ के होते कोई मुसीबत ना हमको छू पाती हैरोज सुबह उठकर छूता हूँ मैं अपनी माँ के पाँवकडी धूप में माँ करती है […]
      Ashutosh Dubey
    • प्यारी कोयल
      प्यारी कोयलप्यारी कोयल-प्यारी कोयल,       तू इतना प्यारा कैसे गाती है?कोयलतू क्या खाती और क्या पीती?,       तू मुझको क्यों नहीं बतलाती है?कू-कू ,कू-कू तेरी बोली,       मन में मेरे घर कर जाती है।तू अपना तो राज़ बता,       फ़िर क्यों नहीं हमराज़ बनाती है?प्रभात हुआ सूरज निकला,       और तू मधुर गति से गाती है।तभी पड़े कानों में मेरे ध्वनि,       आकर मुझको जगाती है। […]
      Ashutosh Dubey
    • पिता का घोंसला
      पिता का घोंसलामेरी खिड़की पर चिड़ियों एक घोसला बना था। मैंने देखा उसमे से कुछ दिनों से आवाज़ नही आ रही थीं।मुझे लगा अब इसे हटा देना चाहिए। घोंसला ऊंचा था।मैंने टेबिल पर कुर्सी रखी और उस पर चढ़ने लगा।मेरे 75 साल के पिता जी जो आज भी शारीरिक रूप से मुझ से ज्यादा तंदुरुस्त हैं चिल्लाए"रुक जा सुशील तुझ से नही बनेगा,मुझे मालूम है तू हर काम थतर मतर करता है।हट मैं […]
      Ashutosh Dubey
    • आदत
      आदतअजीब सा शख्स हैं कुछकभी कहता हैकभी कहता ही नही,खामोश हो दरियारूबी श्रीमालीतो क्या बहता नही,सफर ही कुछऐसा है जिंदगी का,हमसफर हो कोईये जरूरी तो नहीतन्हा क्या यहॉलोग रहते नही,दूंढ लेते है हम अक्सरतन्हाई में भी खुशियाकौन कहता हैतन्हा कोई खुशरहता नही,गुलाब गुलाबहोता है,क्या सुख जाने परकोई गुलाब उसेकहता नही,दिल लगाने कीबात कहते हैं वो,उन्हें क्या खबरहम सिवा अपन […]
      Ashutosh Dubey
    • देश की दशा
      देश की दशा आज कीभारत एक ऐसा देश है जिसका स्वर्णिम इतिहास पूरे विश्व के लिए प्रेरणास्रोत बना है ।सभी क्षेत्रों में इसने जो योगदान दिया है,वह स्तुत्य है ।खगोलशास्त्र में कणाद, गणित में आर्यभट्ट,ब्रह्मशास्त्र में शंकराचार्य, राजनीति में महात्मा गाँधी आदि क्षेत्रों के कई महान चरित्र इस देश के हैं जिन्हें पूरे विश्व में आदर्श के रूप में देखा जाता है ।वर्त्तमान सम […]
      Ashutosh Dubey
  • Month Digest / अभिलेखागार

  • Total Visits

    • 217,338 hits
  • Follow ARARIA अररिया ﺍﺭﺭﯼﺍ on WordPress.com

हाई स्कूल का प्रांगण, अन्नपुर्णा मिठाई दूकान, उमा टाकिज के फिल्म और नेताजी सुभाष स्टेडियम

Posted by Sulabh on October 7, 2009

(स्मृति दीर्घा से कुछ ख़ास पल – सुलभ जायसवाल, अररिया, बिहार)

बहुत ज्यादा नहीं 12-15 वर्ष पहले की बात है. उन दिनों अररिया में सरकारी स्कूल (मध्य विद्यालय और उच्च विद्यालय) में टिफिन / लंच टाइम तक टिक गए तो समझा जाता है की आप अच्छे विद्यार्थी हैं. हाजरी बना प्रथम कक्षा कर के निकल गए  तो आप नियमित विद्यार्थी हैं. यदि प्रतिदिन सातों कक्षा (सायं 4 बजे तक) उपस्थित रहे तो आप बहुत पढाकू हैं.  बहुत पढाकू होना कभी भी स्वास्थय के लिए ठीक नहीं माना गया है… सावधान ऐसी स्थिति में आपके मित्रों की संख्या काफी कम होगी और मुसीबत में या राह चलते कोई झगडा फसाद हो जाए तो आप शायद रोते हुए घर को लौटेंगे.

मेरे आठवीं कक्षा में नामांकन के 2  सप्ताह बाद ही मुझे अपने साथ के और कुछ वरिष्ठ साथियों के कहे अनुसार अपनी दिनचर्या में फेर बदल करना पड़ा. हाई स्कूल के बड़े मैदान में एक कोने के तरफ चापाकल हुआ करती है जहाँ से पानी पीने के बाद नज़र बचाते हुए बांस के टूटे दीवारों, नालियों, ईटों के ढेरों के पास होते हुए अन्नपुर्णा मिठाई दूकान(जहाँ चाय नास्ते का भी उत्तम प्रबंध रहता था) के पिछवारे से प्रवेश करना प्राय सरल ही था. दूकान में अन्दर आने के बाद जल्दी से किसी मेज़-कुर्सी पर जम जाईये. अब आप अररिया शहर के प्रमुख चांदनी चौक पर अवस्थित अन्नपूर्णा होटल के एक सम्मानित ग्राहक हैं.  धड़कते दिल के साथ दो रूपये में समोसे के साथ साथ पकोडे भी खा सकते हैं. धड़कते दिल से कहने का मतलब इतना है की हो सकता है उस समय संयोग से आपके बड़े भैया, चाचा या पिताजी भी चाय पीने वहां पहुँच सकते है. आपातकालीन स्थिति में आपके पास वापिस उसी स्कूल में पहुँचने का रास्ते सदैव खुला रहता है (सिर्फ उनके लिए बंद रहा है जिसने कभी होटल के वेटरों से बदतमीजी की हो).

अब यदि आपके पास पैसे हैं कम से कम तीन-चार रूपये भी तो आप उस होटल से बमुश्किल ढाई-तीन सौ मीटर मैन रोड पर  आगे उमा टाकिज में दाखिल हो सकते हैं. और 70 से 90 दशक के बीच की बॉलीवुड की सदाबहार, साधारण, औसत, हीट और सिल्वर जुबली वाली किसी फिल्म का प्रथम, द्वितीय या तृतीय श्रेणी में बैठ कर आनंद उठा सकते हैं.

बीते कुछ सालों  में शहर के सबसे व्यस्त रोड मेंन पर तरह तरह के दुकानों की संख्या में इजाफा ही हुआ है. लेकिन यह  उमा टाकिज जो शहरी-देहाती जनाना-मर्दाना के भीड़ से गुंजायमान रहता था, अपनी शान को बरकारार  न रख पाया. अकुशल प्रबंधन, मालिक बंधुओं की आपसी अनबन और हॉल में बैठकर सिनेमा देखने का घटता क्रेज़ आदि मिलकर ने शहर के एक आकर्षक पिक्चर पैलेस को कहीं का न छोड़ा.  इस मामले में अन्नपूर्ण स्वीट्स जरुर अपनी प्रतिष्ठा बचाने में सफल रहा. हालांकि दूकान दो भागो में बाँट चुकी है, अब बड़े-बड़े समोसे (सिंघारे)  और स्वादिस्ट पकोड़े  नहीं मिलते हैं. लेकिन आज भी ये चांदनी चौक का एक प्रमुख स्वीट्स कार्नर है.

हाई स्कूल/H.E. जिसका सम्पूर्ण नाम “राजकीयकृत उच्च विद्यालय, अररिया” १९११ में निर्मित भवन का प्रवेश द्वार सहित कुछेक बार मरम्मत हो चूका है, अन्दर के प्रांगन और मैदान में अब यहाँ कोलाहल काफी कम रहता है. मगर मुख्य सड़क पर हमेशा की तरह बाज़ार ठेले और फुटपाथ समेत शोरशराबे से शोभित है.

स्कूल भवन की चारदीवारी शहर के व्यस्त हाट-बाज़ार से जुडी हुई है. सुना है बाज़ार के कुछ दुकानों का किराया स्कूल के फंड में जाता है, वैसे हाट-बाज़ार के बहुत सारे दूकान राज्य सरकार, नगर पालिका और निजी सम्पति के विवाद से ग्रसित है. (माफ़ी चाहूँगा, इस बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं है).

कई बार सोचा की स्कूल में जाकर पता लगाऊं की क्या अब भी वहां आठवीं, नौवीं और दशवीं कक्षा में हिंदी के गद्द-सोपान और वही काव्य संग्रह पढाये जाते हैं या CBSE की तर्ज पर कुछ व्यापक बदलाव  यहाँ भी हुए हैं. क्या अब भी विशेस्वर बाबू संस्कृत की कक्षा नियमित लेते हैं. मुझे आज भी राष्ट्रकवि श्री माखनलाल चुतर्वेदी द्बारा रचित कविता “चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गुथा जाऊं…(शीर्षक- पुष्प की अभिलाषा)” विशेष पसंद है.   कथाकार रामवृक्ष बेनीपुरी ने कैसे 13 वर्ष की उम्र मात्र में साहित्य सृजन का बीडा उठाया, ये बाते मैं उन दिनों अक्सर सोचता था और कुछ लिखने का प्रयास करता था.

Subhash stadium Araria

Subhash stadium Araria

इसी क्रम में कुछ सफलता मिली थी पत्रिका सुमन-सौरभ के सौजन्य से. कितना खुश हुआ था मैं जब पहली बार मेरा नाम शीर्षक प्रतियोगिता के लिए सर्वश्रेष्ट चुना गया था. पुरे मोहल्ले में मेरा नाम सा हो गया था. और सबसे महत्वपूर्ण वो दिन स्वंत्रता दिवस (15-अगस्त-1996) नौंवीं कक्षा में पढ़ते हुए जिला-स्तरीय विज्ञान प्रदर्शनी में भाग लेकर प्रथम स्थान प्राप्त किया. नेताजी सुभाष स्टेडियम में पारितोषिक वितरण समारोह में जिला-पदाधिकारी श्री बी. प्रधान द्वारा पुरस्कृत हुआ. चारो तरफ से  तालियों की गूंज के बीच उनसे हाथ मिलाकर पुरस्कार ग्रहण करते हुए यही सोच रहा था की एक दिन चाँद को भी छु लूँगा.  चाँद को छूने से मेरा मतलब यह था की मैं आगे चलकर इसरो या भावा एटॉमिक रिसर्च सेंटर में अन्तरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में कार्य करूँ. ये तो किशोर मन की उड़ान थी. आज एक व्यस्क और समझदार युवा के रूप में इतना ही सोच पता हूँ की भारत में बेरोजगारी और भ्रष्ट्राचार के उन्मूलन में कुछ महती कार्य करने की जरुरत है और चुनौतयां यह है की निजी क्षेत्र में  एक आई.टी. कंसल्टेंट के रूप में हर महीने नियमित बहुत सारे कार्य निष्पादन के साथ साथ यथोचित धनोपार्जन करते हुए किस प्रकार लक्ष्य की दिशा में आगे बढूँ. थोडा चिंतित हूँ परन्तु हताश बिलकुल नहीं.

 

 

Advertisements

2 Responses to “हाई स्कूल का प्रांगण, अन्नपुर्णा मिठाई दूकान, उमा टाकिज के फिल्म और नेताजी सुभाष स्टेडियम”

  1. Aap bahut achha likhte hai…
    aaj es nibandh ko dekhkar hame v H.E me bitaye din yaad aane lage….

  2. Imtiaz Ahmed said

    Dear,

    It was well scripted and touching memoirs of Araria.
    This skill will be ladder of yours success in comming time,U will catch the Moon.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

 
%d bloggers like this: