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      एक अछूत बच्चे के सवालमैं तो अछूत बच्चा हूँ जीसमझ का भी थोड़ा कच्चा हूँ जी।मुझे समझना है कि पापा क्यों पीते हैं।मुझे समझना है कि घर के बर्तन क्यों रीते हैं।मुझे समझना है कि मम्मी क्यों पिटती हैं।मुझे समझना है कि भूख कैसे मिटती हैं।क्यों मां मुझको मंदिर नहीं जाने देती हैं।क्यों माँ त्योहारों में भीख लेती है।मेरे पापा को कोई काम क्यों नहीं देता हैं।मेरे घर में आ […]
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      वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !हाथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहेध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहींवीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ होतुम निडर डरो नहीं तुम निडर डटो वहींवीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !प्रात हो कि रात हो संग हो न साथ होसूर्य से बढ़े चलो चन्द्र से बढ़े चलोवीर तुम ब […]
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Archive for the ‘Memorable (डायरी)’ Category

अब तो सिर्फ यादें बची हैं.

फलाना बाबू बहुत अच्छा पढ़ाते हैं.

Posted by Sulabh on June 28, 2010

(स्मृति दीर्घा से कुछ ख़ास पल – सुलभ जायसवाल, अररिया, बिहार)

बिन गुरु होईं न ज्ञान… जी यह उक्ति सर्वव्यापी सच है. बात चाहे पटना, दिल्ली की हो या सुदूर ग्राम जिले अररिया की. मैं यहाँ किसी कला संगीत, दर्शन साहित्य या धनुर्विद्या की बात नहीं कर रहा हूँ. मैं बात कर रहा हूँ, हिंदी भाषी क्षेत्रों के निम्न मध्यवर्गीय परिवार का हौव्वा, लड़कियों के विवाहपूर्व की अग्नि परीक्षा, प्रत्येक विद्यार्थी के जीवन की प्रथम कठिन मंजिल “मैट्रिक की परीक्षा” की.  जैसे ही विद्यार्थी सातवीं आठवीं में कदम रखता है एक खोज शुरू हो जाती है मैट्रिक(दसवीं कक्षा) की परीक्षा तक की तैयारी के लिए एक अदद प्रिय मास्साब की. एक ऐसे शिक्षक की जो किशोर वय के विद्यार्थी की सही नब्ज़ पकड़े और मैट्रिक तक बेडा पार करवा दे. खोज होती है एक ऐसे साधारण कद काठी के मास्टर साहेब की जहाँ किसी भी आयुवर्ग के गार्जियन को मासिक ट्यूशन फी देने में ज्यादा परेशानी न होती हो. उन दिनों किसी भी मास्टर साहेब के घर के आँगन में या प्रवेश दरवाजे के आस पास शेड डालकर बेंच डेस्क जोड़कर पठन पाठन का कार्य बड़े इत्मीनान से होता,  न कोई साइन बोर्ड न कोई बैनर न कोई इश्तहार. सिर्फ एक नाम “फलाना बाबू”.

लिली बाबू, देव बाबू, अनिल बाबू, चंपा लाल, सोहन लाल, सुशील मास्टर जैसे कुछ मास्साब खूब लोकप्रिय रहे. आज भी हैं. स्कूलों में चर्चा चलती तुम कहाँ पढ़ते हो, मैं फलाना बाबू के यहाँ, बहुत समझा समझा के पढ़ाते हैं… मैं तो जमुना बाबू के यहाँ पिछले साल उन्ही के यहाँ से सबसे ज्यादा पास हुआ था… अब अंग्रेजी पढने के लिए अनिल बाबू के पास जाने का जौरत नहीं, लालू(मुख्यमंत्री साहब) ने अंग्रेजी को ऑप्शनल कर दिया है ई साल से… लेकिन संस्कृत में बालेश्वर बाबू जैसा विद्वान् जिला भर में नहीं है हंसाते भी हैं और मारते भी बहुत हैं…   प्राय ऐसी ही चर्चा चलती रहती किशोर बालकों के बीच.

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हाई स्कूल का प्रांगण, अन्नपुर्णा मिठाई दूकान, उमा टाकिज के फिल्म और नेताजी सुभाष स्टेडियम

Posted by Sulabh on October 7, 2009

(स्मृति दीर्घा से कुछ ख़ास पल – सुलभ जायसवाल, अररिया, बिहार)

बहुत ज्यादा नहीं 12-15 वर्ष पहले की बात है. उन दिनों अररिया में सरकारी स्कूल (मध्य विद्यालय और उच्च विद्यालय) में टिफिन / लंच टाइम तक टिक गए तो समझा जाता है की आप अच्छे विद्यार्थी हैं. हाजरी बना प्रथम कक्षा कर के निकल गए  तो आप नियमित विद्यार्थी हैं. यदि प्रतिदिन सातों कक्षा (सायं 4 बजे तक) उपस्थित रहे तो आप बहुत पढाकू हैं.  बहुत पढाकू होना कभी भी स्वास्थय के लिए ठीक नहीं माना गया है… सावधान ऐसी स्थिति में आपके मित्रों की संख्या काफी कम होगी और मुसीबत में या राह चलते कोई झगडा फसाद हो जाए तो आप शायद रोते हुए घर को लौटेंगे.

मेरे आठवीं कक्षा में नामांकन के 2  सप्ताह बाद ही मुझे अपने साथ के और कुछ वरिष्ठ साथियों के कहे अनुसार अपनी दिनचर्या में फेर बदल करना पड़ा. हाई स्कूल के बड़े मैदान में एक कोने के तरफ चापाकल हुआ करती है जहाँ से पानी पीने के बाद नज़र बचाते हुए बांस के टूटे दीवारों, नालियों, ईटों के ढेरों के पास होते हुए अन्नपुर्णा मिठाई दूकान(जहाँ चाय नास्ते का भी उत्तम प्रबंध रहता था) के पिछवारे से प्रवेश करना प्राय सरल ही था. दूकान में अन्दर आने के बाद जल्दी से किसी मेज़-कुर्सी पर जम जाईये. अब आप अररिया शहर के प्रमुख चांदनी चौक पर अवस्थित अन्नपूर्णा होटल के एक सम्मानित ग्राहक हैं.  धड़कते दिल के साथ दो रूपये में समोसे के साथ साथ पकोडे भी खा सकते हैं. धड़कते दिल से कहने का मतलब इतना है की हो सकता है उस समय संयोग से आपके बड़े भैया, चाचा या पिताजी भी चाय पीने वहां पहुँच सकते है. आपातकालीन स्थिति में आपके पास वापिस उसी स्कूल में पहुँचने का रास्ते सदैव खुला रहता है (सिर्फ उनके लिए बंद रहा है जिसने कभी होटल के वेटरों से बदतमीजी की हो).

अब यदि आपके पास पैसे हैं कम से कम तीन-चार रूपये भी तो आप उस होटल से बमुश्किल ढाई-तीन सौ मीटर मैन रोड पर  आगे उमा टाकिज में दाखिल हो सकते हैं. और 70 से 90 दशक के बीच की बॉलीवुड की सदाबहार, साधारण, औसत, हीट और सिल्वर जुबली वाली किसी फिल्म का प्रथम, द्वितीय या तृतीय श्रेणी में बैठ कर आनंद उठा सकते हैं.

बीते कुछ सालों  में शहर के सबसे व्यस्त रोड मेंन पर तरह तरह के दुकानों की संख्या में इजाफा ही हुआ है. लेकिन यह  उमा टाकिज जो शहरी-देहाती जनाना-मर्दाना के भीड़ से गुंजायमान रहता था, अपनी शान को बरकारार  न रख पाया. अकुशल प्रबंधन, मालिक बंधुओं की आपसी अनबन और हॉल में बैठकर सिनेमा देखने का घटता क्रेज़ आदि मिलकर ने शहर के एक आकर्षक पिक्चर पैलेस को कहीं का न छोड़ा.  इस मामले में अन्नपूर्ण स्वीट्स जरुर अपनी प्रतिष्ठा बचाने में सफल रहा. हालांकि दूकान दो भागो में बाँट चुकी है, अब बड़े-बड़े समोसे (सिंघारे)  और स्वादिस्ट पकोड़े  नहीं मिलते हैं. लेकिन आज भी ये चांदनी चौक का एक प्रमुख स्वीट्स कार्नर है.

हाई स्कूल/H.E. जिसका सम्पूर्ण नाम “राजकीयकृत उच्च विद्यालय, अररिया” १९११ में निर्मित भवन का प्रवेश द्वार सहित कुछेक बार मरम्मत हो चूका है, अन्दर के प्रांगन और मैदान में अब यहाँ कोलाहल काफी कम रहता है. मगर मुख्य सड़क पर हमेशा की तरह बाज़ार ठेले और फुटपाथ समेत शोरशराबे से शोभित है.

स्कूल भवन की चारदीवारी शहर के व्यस्त हाट-बाज़ार से जुडी हुई है. सुना है बाज़ार के कुछ दुकानों का किराया स्कूल के फंड में जाता है, वैसे हाट-बाज़ार के बहुत सारे दूकान राज्य सरकार, नगर पालिका और निजी सम्पति के विवाद से ग्रसित है. (माफ़ी चाहूँगा, इस बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं है).

कई बार सोचा की स्कूल में जाकर पता लगाऊं की क्या अब भी वहां आठवीं, नौवीं और दशवीं कक्षा में हिंदी के गद्द-सोपान और वही काव्य संग्रह पढाये जाते हैं या CBSE की तर्ज पर कुछ व्यापक बदलाव  यहाँ भी हुए हैं. क्या अब भी विशेस्वर बाबू संस्कृत की कक्षा नियमित लेते हैं. मुझे आज भी राष्ट्रकवि श्री माखनलाल चुतर्वेदी द्बारा रचित कविता “चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गुथा जाऊं…(शीर्षक- पुष्प की अभिलाषा)” विशेष पसंद है.   कथाकार रामवृक्ष बेनीपुरी ने कैसे 13 वर्ष की उम्र मात्र में साहित्य सृजन का बीडा उठाया, ये बाते मैं उन दिनों अक्सर सोचता था और कुछ लिखने का प्रयास करता था.

Subhash stadium Araria

Subhash stadium Araria

इसी क्रम में कुछ सफलता मिली थी पत्रिका सुमन-सौरभ के सौजन्य से. कितना खुश हुआ था मैं जब पहली बार मेरा नाम शीर्षक प्रतियोगिता के लिए सर्वश्रेष्ट चुना गया था. पुरे मोहल्ले में मेरा नाम सा हो गया था. और सबसे महत्वपूर्ण वो दिन स्वंत्रता दिवस (15-अगस्त-1996) नौंवीं कक्षा में पढ़ते हुए जिला-स्तरीय विज्ञान प्रदर्शनी में भाग लेकर प्रथम स्थान प्राप्त किया. नेताजी सुभाष स्टेडियम में पारितोषिक वितरण समारोह में जिला-पदाधिकारी श्री बी. प्रधान द्वारा पुरस्कृत हुआ. चारो तरफ से  तालियों की गूंज के बीच उनसे हाथ मिलाकर पुरस्कार ग्रहण करते हुए यही सोच रहा था की एक दिन चाँद को भी छु लूँगा.  चाँद को छूने से मेरा मतलब यह था की मैं आगे चलकर इसरो या भावा एटॉमिक रिसर्च सेंटर में अन्तरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में कार्य करूँ. ये तो किशोर मन की उड़ान थी. आज एक व्यस्क और समझदार युवा के रूप में इतना ही सोच पता हूँ की भारत में बेरोजगारी और भ्रष्ट्राचार के उन्मूलन में कुछ महती कार्य करने की जरुरत है और चुनौतयां यह है की निजी क्षेत्र में  एक आई.टी. कंसल्टेंट के रूप में हर महीने नियमित बहुत सारे कार्य निष्पादन के साथ साथ यथोचित धनोपार्जन करते हुए किस प्रकार लक्ष्य की दिशा में आगे बढूँ. थोडा चिंतित हूँ परन्तु हताश बिलकुल नहीं.

 

 

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