ARARIA अररिया ﺍﺭﺭﯼﺍ

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    (ऐतिहासिक क्षण ) # Broad Gague starts at Jogbani-Katihar Rail lines. रेलमंत्री द्वारा हरी झंडी दिखाने के साथ ही नयी लाइन पर जोगबनी से कोलकाता के लिये पहली रेल चल पड़ी। # Thanks a ton to Railway deptt.
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    • मच्छरों के प्रकोप के लिए पत्र
      मच्छरों के प्रकोप के लिए पत्रLetter format to the Municipality to drive away mosquitoes from your areaसेवा में ,स्वास्थ्य अधिकारी महोदय ,नगर निगम , इलाहाबाद।महोदय ,मैंने अपने इस पत्र के माध्यम से आपका ध्यान अपने इलाके की तरफ आकृष्ट करना चाहता हूँ जहाँ मच्छरों के प्रकोप से साधारण लोगों का जीवन दूभर हो गया है।शाम को फुट पाठ पर दुकान लगाने वाले गरीब दुकानदार इन […]
      Ashutosh Dubey
    • बदलाव
      बदलाव समय की घड़ी में  समय भी समयानुसार नहीं चलता वह बदल देता है दिशा अपनी तनिक देर में कुछ इस तरह जैसे बड़बड़ा कर  बदल जाती है जीभ और जो घुस जाती है  तपाक से भीतर मुहं के समय बदल देता है दुःख को सुख में  सुख को दुःख में रोते को हँसा देता है, हँसते को रुला देता है और तो और लगे हाथ छोटों से बड़ों को पिटवा भी देता है वह बना देता है रंक को राजा राजा को रंक समय घुल […]
      Ashutosh Dubey
    • रेलवे कर्मचारी के अभद्र व्यवहार के पत्र 
      रेलवे कर्मचारी के अभद्र व्यवहार के पत्र Indecent behaviour of Railway staffसेवा में , प्रभाग अधीक्षक ,उत्तर रेलवे,इलाहाबाद - ११ विषय - रेलवे कर्मचारी के अभद्र व्यवहार के सम्बन्ध में।  महोदय , आपको सूचित करना चाहता हूँ कि गत ११ दिसम्बर को मैं इलाहाबाद से फैज़ाबाद से चलने वाली साकेत एक्सप्रेस से फैज़ाबाद जा रहा था।  मुझे बड़े खेद के साथ बताना पड़ रहा  है कि मार्ग […]
      Ashutosh Dubey
    • बोर्ड परीक्षा का पहला दिन
      बोर्ड परीक्षा का पहला दिनहालांकि मैंने घड़ी में सुबह पांच बजे का अलार्म सेट कर दिया था किन्तु मुझे अलार्म की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी।  मैं सूर्योदय होने से पहले ही सोकर उठ चुका था।  ऐसा इसीलिए नहीं हुआ कि मैं चिंता या तनाव में था बल्कि मैं उत्तेजना और रोमांच का नौबाहु कर रहा था। मैं उठकर सुबह की ताज़ी हवा में साँस लेने  बालकनी में गया।  मैंने पिछली रात को काफी […]
      Ashutosh Dubey
    • मरते तो हम भी है रोज
      मरते तो हम भी है रोज हर तहरीर एक कयायत नही होती !हर रखी हुई चीज अमानत नही होती !!बेबसी की जुबां में जवाब के कितनें लफ्ज हैं,वरना हर खामोशी शराफत नही होती !!तस्वीरों में क्या साज क्या सज्जा है दिलकश,हर आंखों की मासुमियत नही होती !!मरते तो हम भी है रोज इल्म के जहर से ,लेकिन हर मौत की शोहरत नही होती !!जलते है चिराग भी जलते है घर भी ,मगर हर शमां की खासियत नही हो […]
      Ashutosh Dubey
    • इंडियन काफ़्का
      इंडियन काफ़्का मैं हूँ , कमरा है , दीवारें हैं , छत है , सीलन है , घुटन है , सन्नाटा है और मेरा अंतहीन अकेलापन है । हाँ , अकेलापन , जो अकसर मुझे कटहे कुत्ते-सा काटने को दौड़ता है । पर जो मेरे अस्तित्व को स्वीकार तो करता है । जो अब मेरा एकमात्र शत्रु-मित्र है ।        खुद में बंद मैं खुली खिड़की के पास जा खड़ा होता हूँ । अपनी अस्थिरता का अकेला साक्षी । बाहर ए […]
      Ashutosh Dubey
    • औरत क्या है
      औरत क्या है औरत कांच की सतह की तरह,पारदर्शी है औरतइसमें आप देख सकते है अपना प्रतिबिम्ब।जितना अधिक प्यार से इसे पोछेंगे उतनी अधिक चमकदार आपका प्रतिबिम्ब होगा एक औरत के अंदर आप छुपे होते हैं विभिन्न रूपों में। आपकी छवि उसकी लज्जा के अंदर है अगर आप जिद से इसे एक दिन तोड़ते हैं, तो आपकी छवि हज़ार टुकड़ों में बिखर जाएगी और फिर लाख कोशिश के बाद भी उस मोहक प्रतिबिम्ब […]
      Ashutosh Dubey
    • उस दिन
       उस दिनआज होता इस रिश्ते का भी कोई नामअगर उस दिन न होता मुझसे वह काम गलती थी मेरी बस इतनी किया था तुझपे विश्वासबार-बार मन के न कहने पर भीचली गयी तेरे साथहुई उस दिन मैं बदनामतृष्णा सागरदिया बेवफा सबने मुझको नाम ।आज होता इस रिश्ते का भी कोई नामअगर उस दिन न होता मुझसे वह कामबता सबको वफ़ा तो तूने भी न निभाईकिया हमारे रिश्ते को आमजिसे रखना था दिल मे संभाल किया उसे […]
      Ashutosh Dubey
    • बेटी का भविष्य
      बेटी का भविष्यनंदनी आज खाने में क्या है?जोरो की भूख लगी है।नमन ने कुतुहलवश पूछा।तुम्हारी ही पसंद की सारी चीजें हैं नमन, नंदनी ने कहा।खाना खाते ही नमन ने कहा वाह! मजा आ गया। नंदनी मैंने पहले भी कहा अभी भी कहूँगा तुम्हारे हाथों में जादू है। जो भी बनाती हो लाजवाब,जो भी खाए बस खाता जाए।नंदनी ने बीच मे टोकते हुए कहा नमन सोचती हूँ टिफ़िन का काम कर लूँ। हर साल कितने […]
      Ashutosh Dubey
    • शब्दों को कुछ कहने दो
      शब्दों को कुछ कहने दोशब्द का अहसास चीख कर चुप होता है ।उछलता है मचलता है औरफिर दिल के दालानों में पसर कर बैठ जाता है।भावों की उफनती नदी जब मेरे अस्तित्व से होकर गुजरती है।तो शब्दों की परछाइयांतुम्हारी शक्ल सी बहती है उस बाढ़ में।ओस से गिरते हमारे अहसासशब्दों की धूप में सूख जाते हैं।चीखती चांदनी क्यों ढूंढती है शब्दों को।सूरज सबेरे ही शब्दों की धूप से कविता बु […]
      Ashutosh Dubey
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Posted by Sulabh on November 12, 2009

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